उजड़े हुए शजर के हम वो परिंदे हैं,
सूखे हुए दरख़्त ने जिनको पनाह दी।
हद में रहना सीख चुके हैं यारों हम। कुछ न कहना सीख चुके हैं यारों हम।
ग़मग़म के दौर भी मौसम जैसे आते हैं, मौसम पढना सीख चुके हैं यारों हम।
होंठ हमारे भूल चुके हसना मुस्काना, अश्क़ बहाना सीख चुके हैं यारों हम।
अन्तर्मन का द्वंद चरम तक आने दो, कलम पकड़ना सीख चुके हैं यारों हम।
जिसको जो भी कहना है कह लेने दो, अब ताने सुनना सीख चुके हैं यारों हम।
हो गया जख्मी अपनों के वार से। गिर गया हाकिम अपने मयार से।
तन्हाई में मुझसे मिलता नही कोई, मैं दर्द बाँटता हूँ इक तन्हा दीवार से ।
ढूँढते रह जाते हैं अपनों को उम्र भर, मिलता नही खोया हुआ अब इस्तेहार से।
रहबर तुम्ही दिखाओ अपना तजुर्बा अब, मुझको मिला दो यार मिरे गमगुसार से।






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